Tuesday, 10 February 2026

 
 वेबडेस्क । हिंदू धर्म में नवरात्रि का काफी ज्यादा महत्व है. इस दौरान 9 दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. साल में कुल 4 नवरात्र पड़ते हैं जिसमें से ज्यादातर लोग 2 नवरात्र के बारे में जानते हैं. इनमें पहली नवरात्र चैत्र महीने में आती है जिसे वासंतिक नवरात्र कहते हैं और दूसरी आश्विन माह में आती है जिसे शारदीय नवरात्रि कहते हैं. लेकिन इन दोनों नवरात्रियों के अलावा दो नवरात्रि और भी है जिनका काफी महत्व बताया गया है. इन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. इनमें से पहला गुप्त नवरात्र माघ महीने के शुक्ल पक्ष में और दूसरा आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है।
इस साल की दूसरी गुप्त नवरात्रि आज यानी 3 जुलाई से शुरू हो गई है और 10 जुलाई तक चलेगी. बता दें इस नवरात्रि में मां भगवती के गुप्त स्वरूपों की पूजा होती है इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. ये नवरात्रि तंत्र विद्या को मानने वाले लोगों के लिए काफी खास होती है.  मान्यता है कि इन दिनों तांत्रिक प्रयोगों का फल मिलता है और धन प्रात्ति के रास्ते खुलते हैं।
कैसे होती है पूजा
गुप्त नवरात्रि में भी बाकी दोनों नवरात्रियों की तरह कलश स्थापना होती है और 9 दिनों तक व्रत का संकल्प लिया जाता है. तंत्र विद्या में विश्वास रखने वाले लोग इन महाविद्दाओं की पूजा करते हैं जिनमें मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी जैसी देवियां शामिल है।

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की मासिक शिवरात्रि से शुरू होकर सोमवती अमावस्या तक रहेगा। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संस्कृत साहित्याचार्य महेन्द्र कुमार पाठक के मुताबिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को माह की शिवरात्रि होगी। जोकि अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार 1 जून की तारीख है। इस क्रम में रविवार को 14 तारीख के बाद 3 जून को अमावस्या होगी। उसी दिन सोमवती अमावस्या और वट सावित्री व्रत पूरा होगा।
वट में रहता है इनका वास
महेंद्र कुमार पाठक के अनुसार 3 जून को सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा। कहा जाता है कि सावित्री ने अपने पति के जीवन के लिए बरगद के पेड़ के नीचे तपस्या की थी। और वट के वृक्ष ने सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा ताकि जंगली जानवर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सके। इसलिए इसे वट सावित्री व्रत कहा जाने लगा। इस दिन वटवृक्ष को जल से सींचकर उसमें हल्दी लगा कच्चा सूत लपेटते हुए उसकी 11, 21, 108 बार परिक्रमा की जाती है। साथ ही 11, 21 और 108 की संख्या में ही वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं। उन्होंने बताया कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों पर शिव का वास होता है। इसलिए उसका पूजन कल्याणकारी होता है।
महिलाएं पहनती हैं शादी का जोड़ा
रहीनगर के कृष्णदेव चतुर्वेदी की पत्नी सुदामा ने बताया कि बीते 37 साल से वह लगातार वट सावित्री व्रत रख रही हैं। उस दिन वह शादी का जोड़ा पहनकर पूजन अनुष्ठान करती हैं। उनका विवाह 1981 में हुआ था। वह हर साल अलग-अलग वस्तुओं का संकल्प लेकर वटवृक्ष को अर्पित करती हैं। अब तक वह पान, धान, केला, मीठा बताशा, अंगूर आदि अर्पित कर चुकी हैं।
यह है सर्वार्थ सिद्धि योग का महत्व
सर्वार्थ सिद्धि योग एक शुभ और मंगल योग है, जो निश्चित वार और ग्रह नक्षत्र के संयोग से बनता है। यह सभी योग में एक बहुत ही शुभ समय है जो कि ग्रह नक्षत्र के आधार पर गणना करता है। यह योग सभी इच्छाओं तथा मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है। इस योग में पूजापाठ करने और दान करने का विशेष महत्व है। साथ ही इस योग में पूजा करने से पितृ दोष दूर होता है और सभी कार्यों में आपको विशेष सफलता प्राप्‍त होती है।

वेबडेस्क:- अगर आपका बच्चा पढ़ता तो बहुत है लेकिन इसके बाद भी एग्जाम में उसके नंबर कम आते हैं तो शास्त्रों के अनुसार उसे पढ़ने के साथ ही एक खास मंत्र का जाप करने की भी आवश्यकता है। बच्चा अगर प्रतिदिन माता सरस्वती की पूजा करने के साथ ही इस मंत्र का जाप करें तो इससे विद्याध्ययन में आ रही रूकावटें दूर होती हैं और बच्चे का मन पढ़ाई में लगने लगता है। इसी के साथ इससे बच्चे की याददाश्त भी तेज होती है, आइए जानते हैं इस सरस्वती मंत्र के बारे में
सरस्वती मंत्रः-
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।
या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।
या ब्रह्माच्युत्त शंकरः प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।
सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्या पहा ।।
मंत्र का अर्थ :-
जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके, हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें और हमें विधा और बुद्धि प्रदान करें।
  

 
गंगोत्री एवं यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने की सभी तैयारी पूर्ण कर ली गई है। अक्षय तृतीया के पर्व पर शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजा अर्चना के बाद आज वैदिक मंत्रोचारण के साथ 11:30 पर गंगोत्री व 1:15 मिनट पर यमुनोत्री धाम के कपाट देश विदेश के श्रद्धालुओं के लिए खोल दिये जायेंगे। जहां आगामी छह माह तक श्रद्धालु मां गंगा व यमुना के दर्शन कर सकेंगे। मंगलवार को मां गंगा की डोली गंगोत्री धाम पहुंच चुकी है। जबकि मां यमुना की डोली खरसाली से यमुनोत्री धाम के लिए रवाना हो रही है।
इससे पहले छह माह तक अपने शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में निवास करने के बाद सोमवार को मां गंगा की डोली अपने शीतकालीन प्रवास स्थल गंगोत्री धाम के लिए रवाना हो गई थी। डोली को पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ सवा मन (50 किलो) का कलेऊ, स्थानीय पकवान देकर दोपहर 12:35 पर मुखबा के ग्रामीणों ने मां गंगा को विदाई दी। सोमवार सुबह विशेष पूजा अर्चना और आरती के बाद गंगा की उत्सव डोली को सजाया गया। इसके बाद तय मुहूर्त के अनुसार 12:35 पर मां गंगा की उत्सव डोली आर्मी बैंड की धुन पर मुखबा से गंगोत्री धाम के लिए रवाना हुई। गंगा की डोली यात्रा में मुखबा के साथ ही धराली, हर्षिल समेत उपला टकनौर के ग्रामीणों तथा कई तीर्थयात्रि शामिल हुए। मार्कण्डेय पुरी स्थित दुर्गा मंदिर में पहुंचने के बाद मां गंगा के साथ भक्तों ने अल्प विश्राम किया। मुखबा के प्राचीन पैदल यात्रा पथ से होते हुए डोली शाम को भैरों घाटी पहुंची।
चारधाम यात्रा के पहले धाम यमुनोत्री के लिए मां यमुना की डोली शनिदेव की अगुवाई में मंगलवार (आज) अपने शीतकालीन प्रवास खरसाली से सुबह 9 बजे यमुनोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी। जो दोपहर 11 बजे यमुनोत्री मंदिर पहुंचेगी। जहां विधिवत पूजा अर्चना एवं हवन के बाद दोपहर 1:15 बजे यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। इसके साथ ही प्रदेश में मंगलवार को चारधाम यात्रा का विधिवत शुरू हो जायेगी।
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