Tuesday, 10 February 2026

 
पब्लिकयूवाच- । जनक नंदिनी एवं प्रभु श्रीराम की अर्द्धांगिनी सीताजी का वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को प्राकट्य हुआ था। यह दिन जानकी नवमी या सीता नवमी के रूप में देशभर में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सर्वमंगलदायिनी माता सीता का व्रत करने वाली महिलाओं के अंदर धैर्य, त्याग, शील, ममता और समर्पण जैसे गुण आते है साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ता है। महिलाओं को अपने पति की दीर्घायु और संतान के साथ पारिवारिक शांति एवं आरोग्यता के लिए भगवान श्रीराम-जानकी की पूजा जरूर करनी चाहिए । 
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस पावन पर्व पर जो भी भगवान राम सहित माँ जानकी का व्रत-पूजन करता है उसे पृथ्वी दान का फल एवं समस्त तीर्थ भ्रमण का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है एवं समस्त प्रकार के दुखों, रोगों व संतापों से मुक्ति मिलती है। सीता नवमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। कहते हैं इस दिन दिया गया दान कन्या दान और चारधाम तीर्थ के बराबर माना जाता है। सूर्य, अग्नि एवं चन्द्रमा का प्रकाश हैं सीता
सीता नवमी शुभ फलदायी है क्योंकि भगवान श्री राम स्वयं विष्णु तो माता सीता लक्ष्मी का स्वरूप हैं। सीता नवमी के दिन वे धरा पर अवतरित हुई इस कारण इस सौभाग्यशाली दिन जो भी माता सीता की पूजा अर्चना प्रभु श्री राम के साथ करता है उन पर भगवान श्री हरि और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। माता सीता अपने भक्तों को धन, स्वास्थ्य, बुद्धि और समृद्धि प्रदान करती हैं। माँ सीता भूमि रूप हैं,भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा भी कहा जाता है। माता सीता के स्वरूप सूर्य, अग्नि और चंद्र माने जाते हैं। चन्द्रमा की किरणें विभिन्न औषधिओं को रोग निदान का गुण प्रदान करती हैं। ये चंद्र किरणें अमृतदायिनी सीता का प्राणदायी और आरोग्यवर्धक प्रसाद है। इस दिन माता सीता और भगवान श्रीराम की पूजा के साथ चंद्र देव की पूजा भी जरूर करनी चाहिए।
माँ सीताजी ने ही हनुमानजी को उनकी सेवा-भक्ति  से प्रसन्न  होकर अष्ट सिद्धियों तथा नव निधियों का स्वामी बनाया । रामचरितमानस में तुलसी दास जी ने सीताजी की वंदना करते हुए उन्हें उत्पत्ति,पालन और संहार करने वाली,क्लेशों को हरने वाली एवं समस्त जगत का कल्याण करने वाली राम वल्लभा कहा है ।अनेकों  ग्रंथ उन्हें जगतमाता,एकमात्र सत्य,योगमाया का साक्षात स्वरुप व समस्त शक्तियों की स्त्रोत तथा मुक्तिदायनी कहकर उनकी आराधना करते हैं । सीताजी  क्रिया-शक्ति,इच्छा-शक्ति और ज्ञान-शक्ति,तीनों रूपों में प्रकट होती हैं ।
इस दिन सुहाग की वस्तुओं का करें दान
रोली,अक्षत,कुमकुम,मोली एवं लाल और पीले पुष्प व मिठाई से भगवान राम और उनकी प्राणप्रिया सीताजी की पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भक्तिभाव से पूजा करें।इस दिन श्रीराम-जानकी की पूजा में तिल या घी का दीपक जलाना अतिशुभ फलदायक है।सीता नवमी के दिन माता सीता को सोलह श्रृंगार एवं लाल चुनरी अर्पित करने से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जिन्हें संतान की कामना है वह इस दिन सीता स्रोत का पाठ जरूर करें। इसके बाद सियाराम का भोग लगाकर इन मन्त्रों का जाप करें।
ॐ सीतायाः पतये नमः ।।
और  श्रीसीता-रामाय नमः।।
ऐसे प्रकट हुई देवी सीता
सीता मां के जन्म से जुड़ी कथा का रामायण में उल्लेख किया गया है। इस कथा के अनुसार एक बार मिथिला राज्य में बहुत सालों से बारिश नहीं हो रही थी। वर्षा के अभाव में मिथिला के निवासी और राजा जनक बहुत चिंतित थे। उन्होंने ऋषियों से इस विषय़ पर मंत्रणा की तो उन्होंने कहा कि यदि राजा जनक स्वयं खेत में हल चलाएं तो इन्द्र देव प्रसन्न होंगे और बारिश होगी। राजा जनक ने ऋषियों की बात मानकर हल चलाया। हल चलाते समय उनका हल एक कलश से टकराया जिसमें एक सुंदर कन्या थी। राजा निःसंतान थे इसलिए वह बहुत हर्षित हुए और उन्होंने उस कन्या का नाम सीता रखा। सीता को जानकी और मिथिलेश कुमारी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इस प्रकार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता प्रकट हुईं थीं।

रायपुर । नवरात्रि महापर्व पर माता रानी की पूजा अर्चना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है. हिंदू धर्म में बताए गए मां के 9 स्वरूपों का अपना एक विशेष महत्व होता है. आज नवरात्रि के छठवें दिन मां नव दुर्गा के कात्यानी स्वरुप की पूजा अर्चना की जाती है. धार्मिक पुराणों के अनुसार देवी मां ने महिषासुर का मर्दन किया था. देवी कात्यायनी की पूजा करने से मन की शक्ति मजबूत होती है और साधक इन्द्रियों को वश में कर सकता है  । 
मां कात्‍यायनी की पूजा विधि
नवरात्रि के छठे दिन यानी कि षष्‍ठी को स्‍नान कर लाल या पीले रंग के वस्‍त्र पहनें.
 सबसे पहले घर के पूजा स्‍थान नया मंदिर में देवी कात्‍यायनी की प्रतिमा या चित्र स्‍थापित करें.
 अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें.
अब मां की प्रतिमा के आगे दीपक रखें
 अब हाथ में फूल लेकर मां को प्रणाम कर उनका ध्‍यान करें.
 इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें.
धूप-दीपक से मां की आरती उतारें.
 आरती के बाद सभी में प्रसाद वितरित कर स्‍वयं भी ग्रहण करें.
ध्यान
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
स्तोत्र पाठ
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती घूमते हुए काशी पहुंच गए। वहां पर भगवान शिव अपना मुंह पूर्व दिशा की ओर करके बैठे थे। उसी समय पार्वती ने पीछे से आकर अपने हाथों से भगवान शिव की आंखों को बंद कर दिया। ऐसा करने पर उस पल के लिए पूरे संसार में अंधेरा छा गया। दुनिया को बचाने के लिए शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी, जिससे संसार में पुनः रोशनी बहाल हो गई।
दूसरी तरफ तीसरी आंख खुलने से पैदा हुई गर्मी से पार्वती को पसीना आ गया। उस पसीने की बूंदों से एक बालक प्रकट हुआ। उस बालक का मुंह बहुत बड़ा और भंयकर था। बालक को देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से उसकी उत्पत्ति के बारे में पूछा। शिव ने बताया कि चूंकि उसकी उत्पत्ति तुम्हारे पसीने से हुई है इसलिए यह हमारा पुत्र है। अंधकार में उत्पन्न होने की वजह से उसका नामअंधक रखा गया।
कुछ समय बाद दैत्य हिरण्याक्ष ने भगवान शिव से पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। तब शिव ने अंधक को उसे पुत्र रूप में प्रदान कर दिया। अंधक ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि 'वह तभी मरे जब वो यौन लालसा से अपनी मां की और देखे।' अंधक ने सोचा था कि ऐसा कभी नहीं होगा क्योकि उसकी कोई मां ही नहीं है। वरदान मिलने के बाद अंधक देवताओं को परास्त करके तीनों लोकों का राजा बन गया।
फिर उसने विवाह करने का विचार किया। तय किया कि वह तीनों लोकों की सबसे सुन्दर स्त्री से विवाह करेगा। उसे पता चला कि तीनों लोकों में पर्वतों की राजकुमारी पार्वती से सुन्दर कोई नहीं है। जिसने अपने पिता का वैभव त्याग कर शिव से विवाह कर लिया है। वह तुरंत पार्वती के पास गया और उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। पार्वती के मना करने पर वह पार्वती को जबरदस्ती ले जाने लगा तो देवी ने शिव का आह्वान किया।
पार्वती के आह्वान पर शिव वहां उपस्थित हुए और उन्होंने अंधक को बताया कि तुम पार्वती के ही पुत्र हो। ऐसा कहकर उन्होंने अंधक का वध कर दिया।
विशेष
वामन पुराण की कथा में अंधक शिव-पार्वती का पुत्र बताया गया है जिसका वध शिव करते है। एक अन्य मतानुसार अंधक, कश्यप ऋषि और दिति का पुत्र था जिसका वध शिव ने किया था।

 
 
वेबडेस्क :- श्रावण माह के पहले सोमवार पर आज 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा. सोमवार तड़के सुबह तीन बजे भगवान महाकालेश्वर का दूध-दही से अभिषेक किया गया, जिसके बाद विधि-विधान से पंडे-पूजारियों ने महाकाल की भस्म आरती की. खास बात है कि आज डेढ़ घंटे पहले ही महाकाल की आरती की गई.श्रावण में शिव भक्ति और आराधना की विशेष महत्व है. ऐसे में श्रावण के पहले सोमवार पर हजारों की तादात में श्रद्धालु विश्व प्रसिद्ध उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर पहुंचे. देर रात 12 बजे से ही महाकाल के दर्शन के लिए भक्तों की लाईन लगना शुरू हो गई.सुबह ढाई बजे महाकालेश्वर के गर्भगृह के पट खोले गए, जिसके बाद श्रद्धालुओं ने महाकाल को जल चढ़ाया. पंडे-पुजारियों ने दुध, दही, पंचामृत, दृव्य प्रदार्थ, फलों के रस से महाकाल का अभिषेक किया. महानिर्वाणी अखाड़े के प्रतिनिधि द्वारा विधि-विधान महाकालेश्वर की भस्म आरती की गई, जिसके बाद महाकालेश्वर का आकर्षक श्रंगार किया गया.इस दौरान श्रद्धालु भोले की भक्ति में लीन हो गए और महाकाल के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा. पंडे-पुजारियों ने ढोल-नगाडों के साथ महाकाल की श्रंगार आरती की और फिर श्रद्धालुओं के दर्शन करने का सिलसिला शुरू हो गया. अब दिनभर देश भर से आए सैकड़ों श्रद्धालु महाकाल के दर्शन कर आशिर्वाद लेंगे. श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर प्रशासन ने विशेष प्रबंध किए है । 
इसके अलावा सावन के पहले सोमवार पूरी की पूरी काशी नगरी शिवमय हो गई. न केवल पूर्वांचल बल्कि देश और विदेश के कोने-कोने से शिवभक्त बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए जुट गए.बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए कांवडियां देर रात से ही गंगा स्नान करके विश्वनाथ के दर्शन के लिए कतार में लग गए. अनुमान लगाया जा रहा है कि आज सावन के पहले सोमवार लगभग दो लाख से दर्शनार्थी बाबा काशी विश्वनाथ का दर्शन करेंगे.सावन के पहले सोमवार के दर्शन के मद्देनजर बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर में पूरी तरह से तैयारियों के दावे भी किए जा रहें हैं, जिसमें श्रद्धालुओं के लिए हवा-पानी से लेकर फ्री लॉकर और दवा के अलावा पहली बार चार गेट से इंट्री की बात बताई गई.पहली बार बाबा काशी विश्वानाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का प्रवेश गर्भगृह में रोका गया है और झांकी दर्शन की व्यवस्था की गई है, ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके । 
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